दिले राम सेन।बलौदाबाजार/कसडोल।प्रशासनिक व्यवस्था में एक बुनियादी नियम है—“कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता।” लेकिन बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के कसडोल विकासखंड में स्वास्थ्य विभाग इस सिद्धांत को ताक पर रखता नजर आ रहा है। ग्रामीण स्वास्थ्य संयोजकों (RHO) की मूल पदस्थापना स्थल से गायब रहने और नियम विरुद्ध वेतन भुगतान के गंभीर वित्तीय घोटाले की जांच अब विवादों के घेरे में है। कारण? खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) ने जांच की जिम्मेदारी अपने ही अधीनस्थ कर्मचारियों को सौंप दी है, जिससे निष्पक्षता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है।

क्या है पूरा मामला?
मामला शासकीय धन के दुरुपयोग और वनांचल की स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ खिलवाड़ से जुड़ा है। आरटीआई कार्यकर्ता दिले राम सेन ने कलेक्टर बलौदाबाजार-भाटापारा को एक शिकायती पत्र सौंपा था। शिकायत के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- आदेश की अवहेलना: मार्च 2026 में CMHO और 27 मार्च 2026 को BMO कसडोल द्वारा कड़े निर्देश जारी किए गए थे कि सभी RHO अपने मूल ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में ड्यूटी पर लौटें। इसके बावजूद कई कर्मचारी कार्यस्थल पर अनुपस्थित रहे।
- अवैध वेतन आहरण: बिना किसी कार्यभार ग्रहण प्रतिवेदन और बिना नियमित उपस्थिति के, जिम्मेदार अधिकारियों की कथित मिलीभगत से इन गायब कर्मचारियों को हर महीने नियमित वेतन का भुगतान किया जाता रहा।
- राजस्व को चपत: वनांचल के गरीब ग्रामीणों को स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रखकर सरकारी खजाने से लाखों रुपये का चूना लगाया गया।
अपनों को बचाने की कवायद? जांच समिति पर उठे सवाल
कलेक्टर के संज्ञान में मामला आने के बाद कसडोल BMO कार्यालय ने आनन-फानन में एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन कर दिया। समिति में शामिल हैं:
- डॉ. राकेश कुमार प्रधान (जनरल सर्जन) – अध्यक्ष
- रामनारायण साहू – सदस्य
- नारायण सिंह वर्मा – सदस्य
- विवाद की जड़: इस समिति के गठन के साथ ही निष्पक्षता की हवा निकल गई। समिति में शामिल तीनों चेहरे सीधे तौर पर BMO के अधीन काम करते हैं। शिकायतकर्ता दिले राम सेन का तर्क बेहद व्यावहारिक और कानून सम्मत है—जिस कार्यालय की प्रशासनिक निगरानी, हाजिरी बाबू और खुद अधिकारियों की मिलीभगत पर सवाल हैं, उसी कार्यालय के छोटे कर्मचारी अपने ‘बॉस’ या सहकर्मियों के खिलाफ निष्पक्ष रिपोर्ट कैसे दे सकते हैं? क्या उन पर प्रशासनिक दबाव नहीं होगा?
स्वतंत्र जांच की मांग, जिला प्रशासन की चुप्पी पर नजरें
शिकायतकर्ता दिले राम सेन ने मांग की है कि इस पूरे घालमेल की गंभीरता को देखते हुए जांच को जिला स्तरीय या संभाग स्तरीय किसी स्वतंत्र विंग (जैसे जिला पंचायत या जेडी स्वास्थ्य) को सौंपा जाना चाहिए था। स्थानीय स्तर पर गठित यह समिति केवल ‘लीपापोती’ का जरिया बनकर रह जाएगी।
अब देखना यह है कि क्या बलौदाबाजार कलेक्टर इस गंभीर प्रशासनिक चूक का संज्ञान लेकर कसडोल BMO द्वारा गठित इस ‘कठपुतली समिति’ को भंग कर किसी निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराते हैं, या फिर स्वास्थ्य विभाग में चल रहा यह ‘वेतन घोटाला’ ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। वनांचल के ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों की नजरें अब जिला प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।



