दिले राम सेन। पलारी पुलिस की फाइलों में कैद है 2007 की भर्ती का सच; RTI को ढाल बनाकर क्या सच छिपा रहा प्रशासन?

बलौदाबाजार | कहते हैं “न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है,” लेकिन बलौदाबाजार जिले के पलारी थाने में यह कहावत हकीकत बन चुकी है। जनपद पंचायत पलारी में वर्ष 2007 में हुई शिक्षाकर्मी वर्ग-3 की भर्ती का भविष्य पिछले 15 सालों से थाने के मालखाने में धूल फांक रहा है। 2011 में ‘जांच’ के नाम पर जब्त किए गए मूल दस्तावेज आज 2026 बीत जाने के बाद भी वापस नहीं लौटे हैं।
जांच या दस्तावेजों की ‘अघोषित कैद’?
नियमतः नियुक्तियों से जुड़े मूल दस्तावेज जनपद पंचायत (CEO कार्यालय) की कस्टडी में होने चाहिए। लेकिन 2011 में पलारी पुलिस इन दस्तावेजों को यह कहकर ले गई कि इनकी जांच की जानी है।
- हैरानी की बात: 15 साल बीत गए, लेकिन पुलिस आज तक यह तय नहीं कर पाई कि भर्ती में गड़बड़ी हुई थी या नहीं।
- बड़ा सवाल: क्या डेढ़ दशक का समय एक भर्ती प्रक्रिया की जांच पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं है? या फिर ‘जांच’ केवल दस्तावेजों को दबाए रखने का एक बहाना है?
RTI: जब सूचना के अधिकार का ही ‘अधिकार’ छीन लिया गया
इस मामले में पारदर्शिता लाने की कोशिशों को भी तकनीकी दांव-पेंचों से दबाया जा रहा है। जब जागरूक नागरिकों ने RTI के जरिए समस्त शिक्षकों की दस्तावेज की मांग की गई थी तो उसे यह कहकर खारिज कर दिया गया कि सूचना देने से “अन्वेषण (Investigation) प्रभावित होगा।”
तार्किक सवाल: जो जांच 15 साल में रेंगते हुए भी मंजिल तक नहीं पहुँची, वह एक सूचना देने से कैसे पटरी से उतर सकती है? धारा 8(झ) का हवाला देना अब पुलिस और प्रशासन के लिए एक ‘सुरक्षित ढाल’ बन गया है।
तारीख-पर-तारीख: तंत्र की सुस्ती का नमूना
अपीलार्थी न्याय के लिए भटक रहे हैं, लेकिन प्रशासन कभी धारा 144, कभी आगजनी तो कभी कानून व्यवस्था का हवाला देकर सुनवाइयां टालता रहा। अब इस मामले की अगली उम्मीद ‘राज्य सूचना आयोग’ नवा रायपुर पर टिकी है।
- प्रकरण क्रमांक: A/5199/2024
- अगली सुनवाई: 06 मई 2027
(सोचिए, एक RTI की अपील की सुनवाई के लिए भी साल भर बाद की तारीख दी जा रही है।)
सिस्टम से सीधे सवाल:
- जवाबदेही किसकी? क्या गृह विभाग या जिला प्रशासन ने कभी पलारी पुलिस से पूछा कि 15 साल से यह जांच ठंडे बस्ते में क्यों है?
- दोषी कौन? यदि भर्ती में भ्रष्टाचार हुआ था, तो अब तक चालान पेश क्यों नहीं हुआ? और यदि सब सही था, तो दस्तावेज जब्त क्यों रखे गए हैं?
- भविष्य का क्या? उन युवाओं का क्या, जिनका करियर और हक इन बंद फाइलों में सिमट कर रह गया है?
यह मामला सिर्फ फाइलों के गुम होने का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख का है। पलारी थाने की यह कार्यप्रणाली न केवल पुलिस की छवि धूमिल कर रही है, बल्कि भ्रष्टाचार की आशंकाओं को भी पुख्ता कर रही है। यदि राज्य सूचना आयोग इस पर सख्त रुख नहीं अपनाता, तो “सूचना का अधिकार” महज एक कागजी शेर बनकर रह जाएगा।



