दिले राम सेन।कसडोल बलौदाबाजार जिले के कसडोल वन मंडल से एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। जहाँ एक ओर शासन सुशासन की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वन विभाग के आला अधिकारी न केवल सरकारी आवास में नियमों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं, बल्कि अपनी लापरवाही का ठीकरा गरीब दैनिक वेतनभोगी श्रमिकों पर फोड़ रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, दिनांक 25 जनवरी 2026 की रात सोनाखान परिक्षेत्र अधिकारी के आवास गृह में एक हाई-प्रोफाइल पार्टी का आयोजन किया गया था। आरोप है कि इस पार्टी में कसडोल के उप वन मंडलाधिकारी (SDO) अनिल वर्मा, प्रशिक्षु ACF गुलशन साहू, प्रशिक्षु रेंजर दीपक कुमार कौशिक और अन्य कर्मचारी मौजूद थे। रात भर नशे की हालत में नाच-गाने और शोर-शराबे के बीच पार्टी चलती रही।
पार्टी के बाद SDO अनिल वर्मा ने दावा किया कि उनकी सोने की चेन गायब हो गई है। बजाय इसकी शिकायत पुलिस में करने के, अधिकारियों ने वहां मौजूद सुरक्षा श्रमिकों और वाहन चालकों पर चोरी का शक जताया।
तांत्रिक विद्या और मानसिक प्रताड़ना का आरोप
शिकायतकर्ताओं—मनोज यादव, सुबे लाल प्रधान, राजेश सेन और अनंत कुमार यादव—का आरोप है कि चोरी का पता लगाने के लिए अधिकारियों ने कानून का सहारा लेने के बजाय ‘तांत्रिक विद्या’ और अंधविश्वास का सहारा लिया। पीड़ितों का कहना है कि उन्हें झूठे आरोपों में फंसाकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और दबाव बनाया गया।
बिना जांच के काम से निकाला, परिवार दाने-दाने को मोहताज
सबसे दुखद पहलू यह है कि बिना किसी कानूनी जांच या ठोस सबूत के, इन चार श्रमिकों को पिछले तीन महीनों से काम से निकाल दिया गया है। पीड़ितों ने बताया:
“हम गरीब लोग हैं। हमने न चोरी की है और न ही हमें कुछ पता है। साहब ने पुलिस को सूचना तक नहीं दी और हमें नौकरी से निकाल दिया। अब हमारे पास परिवार पालने के लिए कोई साधन नहीं बचा है।”
गंभीर सवाल जो खड़े होते हैं:
- नियमों की अनदेखी: क्या सरकारी आवास में रात के डेढ़ बजे तक इस तरह की पार्टियों का आयोजन नियमानुसार सही है?
- कानून हाथ में क्यों? यदि चोरी हुई थी, तो SDO ने पुलिस में FIR दर्ज क्यों नहीं कराई? तांत्रिक विद्या का सहारा लेना क्या एक राजपत्रित अधिकारी को शोभा देता है?
- मानवाधिकार का हनन: तीन महीने से बिना वेतन और बिना काम के इन श्रमिकों का भविष्य अंधकार में है। इसका जिम्मेदार कौन है?
न्याय की गुहार
पीड़ित श्रमिकों ने अब ‘सुशासन पोर्टल’ और उच्च अधिकारियों से न्याय की गुहार लगाई है। उनकी मांग है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जाए, उन्हें ससम्मान काम पर वापस रखा जाए और पिछले तीन महीने का बकाया वेतन दिलाया जाए।
अब देखना यह होगा कि वन विभाग और जिला प्रशासन इन रसूखदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई करता है या फिर गरीब श्रमिकों की आवाज फाइलों में ही दबकर रह जाएगी।



