
दिले राम सेन। बलौदाबाजार। छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक बड़ा कानूनी पेच फंस गया है। ग्राम डमरू स्थित शासकीय आयुर्वेद औषधालय सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के उल्लंघन के चलते अब राज्य सूचना आयोग की कटघरे में है। आरटीआई एक्टिविस्ट दिलेराम सेन की शिकायत पर आयोग ने कड़ा रुख अपनाते हुए 9 दिसंबर 2026 को सुनवाई की तारीख मुकर्रर की है।
क्या है पूरा विवाद? (प्रकरण क्रमांक: C/2363/2023)
यह मामला प्रक्रियात्मक चूक से कहीं अधिक ‘कानूनी अनदेखी’ का नजर आता है। कसडोल निवासी दिलेराम सेन ने एक आरटीआई आवेदन प्रस्तुत किया था। आरोप है कि औषधालय में जन सूचना अधिकारी (PIO) मौजूद न होने के बाद भी आवेदन को धारा 6(3) के तहत उचित कार्यालय भेजने के बजाय “अनधिकृत” बताकर वापस कर दिया गया।
कानून की बात: RTI अधिनियम की धारा 6(3) स्पष्ट करती है कि यदि आवेदन गलत विभाग में पहुंच जाए, तो उसे 7 दिनों के भीतर संबंधित विभाग को ट्रांसफर करना प्राप्तकर्ता की जिम्मेदारी है। आवेदन लौटाना कानूनन गलत है।
हैरान करने वाले तर्क: “औषधालय कार्यालय नहीं है”
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू औषधालय प्रशासन का वह जवाब है, जो उन्होंने राज्य सूचना आयोग को सौंपा है। प्रशासन का तर्क है कि:
- संस्था केवल एक चिकित्सा केंद्र है, ‘कार्यालय’ नहीं।
- यहाँ जन सूचना अधिकारी की नियुक्ति की अनिवार्यता नहीं है।
विशेषज्ञों की राय: विधि विशेषज्ञों का मानना है कि कोई भी सरकारी संस्थान जो सार्वजनिक धन से संचालित है, वह सार्वजनिक प्राधिकरण की श्रेणी में आता है। ऐसे में यह तर्क कानून की कसौटी पर कमजोर नजर आता है।
दोहरी जिम्मेदारी, फिर भी चूक
मामले में एक दिलचस्प मोड़ यह भी है कि जिस अधिकारी पर आवेदन अग्रेषित न करने का आरोप है, वे आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी होने के साथ-साथ जिला आयुर्वेद अधिकारी का प्रभार भी संभाल रहे थे। शिकायतकर्ता का सीधा आरोप है कि उच्च पद पर रहते हुए भी प्रक्रिया का पालन न करना सूचना को जानबूझकर दबाने की कोशिश है।
आयोग की सुनवाई में इन 3 बिंदुओं पर होगी नजर:
- क्या आवेदन को जानबूझकर ‘अवैध’ बताकर पारदर्शिता की मूल भावना को ठेस पहुँचाई गई?
- क्या धारा 6(3) का उल्लंघन कर आवेदक को परेशान किया गया?
- क्या संबंधित अधिकारी पर आर्थिक दंड (जुर्माना) लगाया जाएगा?
पारदर्शिता की कसौटी:
शिकायतकर्ता दिलेराम सेन का कहना है, “यह लड़ाई केवल एक जानकारी की नहीं, बल्कि उस सिस्टम के खिलाफ है जो ग्रामीणों को उनके अधिकारों से वंचित रखता है।” अब सबकी निगाहें 6 दिसंबर को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जो ग्रामीण क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्रों में आरटीआई के क्रियान्वयन के लिए एक मिसाल साबित हो सकती है।



