Homeword pressन्याय की पहली सीढ़ी ही टूटी: प्रथम अपीलीय अधिकारी के आदेश पर...

न्याय की पहली सीढ़ी ही टूटी: प्रथम अपीलीय अधिकारी के आदेश पर उठे तीखे सवाल


दिले राम सेन। बलौदाबाजार। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाए गए कानून का एक बार फिर उल्लंघन सामने आया है। वनमंडल बलौदाबाजार अंतर्गत अपील प्रकरण क्रमांक 11/2025 में प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा पारित आदेश ने न केवल अधिनियम की मूल भावना को ठेस पहुंचाई है, बल्कि आवेदक को अनावश्यक रूप से राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील के लिए बाध्य कर दिया है।

ग्राम सेमरिया निवासी आरटीआई एक्टिविस्ट श्री दिलेराम सेन ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत परिक्षेत्र अधिकारी अर्जुनी से 01.11.2024 से 04.09.2025 तक रेगुलर मद से कराए गए समस्त कार्यों के प्रमाणकों की प्रमाणित छायाप्रति मांगी थी। समय-सीमा में सूचना उपलब्ध नहीं कराए जाने पर उन्होंने प्रथम अपील दायर की।

प्रथम अपील की सुनवाई 11 दिसंबर 2025 को वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से हुई। जनसूचना अधिकारी ने जानकारी को “व्यक्तिगत” बताते हुए धारा 8(1)(j) का हवाला दिया।
हालांकि, स्वयं प्रथम अपीलीय अधिकारी ने यह माना कि व्यक्तिगत जानकारी (जैसे खाता क्रमांक, आधार संख्या आदि) को छुपाकर सूचना दी जा सकती है, जो कि सूचना आयोगों और न्यायालयों द्वारा पहले से स्थापित सिद्धांत है।

इसके बावजूद, 26 दिसंबर 2025 को पारित आदेश में प्रथम अपीलीय अधिकारी ने जनसूचना अधिकारी को निर्देश दिया कि सूचना “सशुल्क” प्रदान की जाए।
जबकि—
सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 7(6) स्पष्ट रूप से कहती है कि
यदि निर्धारित समय-सीमा में सूचना उपलब्ध नहीं कराई जाती है, तो सूचना निशुल्क दी जाएगी।
यहाँ यह निर्विवाद है कि सूचना समय पर नहीं दी गई, जिसके कारण प्रथम अपील करनी पड़ी।

कानूनी जानकारों के अनुसार, प्रथम अपीलीय अधिकारी का यह आदेश
धारा 7(6) का सीधा उल्लंघन है
तथा आवेदक के वैधानिक अधिकारों का हनन करता है
सूचना देने का निर्देश देकर भी उसे सशुल्क करना, कानून की मंशा के विपरीत है।

इस त्रुटिपूर्ण आदेश के कारण अब आवेदक राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील करने को विवश है, जिससे—
समय,,,,धन,,,और प्रशासनिक संसाधनों की अनावश्यक बर्बादी होगी।

यह मामला न केवल एक आवेदक के अधिकारों से जुड़ा है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किस प्रकार प्रथम अपीलीय स्तर पर ही यदि कानून का सही पालन हो जाए, तो उच्च आयोगों पर बोझ कम किया जा सकता है।

सूचना का अधिकार अधिनियम नागरिकों को सशक्त बनाने का कानून है, न कि उन्हें और अधिक अपीलों में उलझाने का माध्यम। प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा निशुल्क सूचना देने का स्पष्ट आदेश न देना, अधिनियम की भावना और प्रावधानों—दोनों के विरुद्ध है।
अब देखना यह है कि राज्य सूचना आयोग इस मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होती है।

RELATED ARTICLES
Jharkhand
scattered clouds
29.2 ° C
29.2 °
29.2 °
53 %
2.3kmh
50 %
Tue
29 °
Wed
22 °
Thu
23 °
Fri
24 °
Sat
28 °

Most Popular