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करोड़ों का नशा, लाखों का ‘कागजी’ प्रचार: बलौदाबाजार में समाज कल्याण विभाग का बड़ा खेल!

दिले राम सेन। बलौदाबाजार। सरकारी फाइलों में नशा मुक्ति के दावे जितने गुलाबी हैं, हकीकत उतनी ही स्याह। बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में ‘भारत माता वाहिनी’ के नाम पर लाखों रुपये के सरकारी धन का ऐसा ‘सफाया’ किया गया है कि जमीन पर न तो पोस्टर दिखे और न ही जागरूकता।

​आरटीआई (RTI) से निकले दस्तावेजों ने विभाग के उस तिलस्म को तोड़ दिया है, जिसके पीछे ‘प्रचार-प्रसार’ की आड़ में बंदरबांट का अंदेशा जताया जा रहा है।

₹5.37 लाख ‘स्वाहा’, पर ढूंढने से भी नहीं दिख रहे बैनर

​सूचना के अधिकार के तहत एक्टिविस्ट दिलेराम सेन द्वारा प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, समाज कल्याण विभाग ने वर्ष 2024-25 में प्रचार सामग्री के नाम पर ₹5,37,200 की भारी-भरकम राशि लुटा दी। हैरानी की बात यह है कि सारा काम एक ही प्रिंटर्स (निर्मल ऑफसेट) को थमा दिया गया।

बिल बुक की ‘जादुई’ एंट्री:

  • बिल नंबर 1043: ₹2,72,200 (होर्डिंग, बैनर और पेंटिंग के नाम पर)
  • बिल नंबर 1044: ₹2,65,000 (ब्रोशर, पाम्पलेट और फ्लेक्स के नाम पर)
  • फाइल में ‘एक्शन’, फील्ड में ‘सन्नाटा’
    विभाग के आदेश क्रमांक 123724 स.क./2024-25 के मुताबिक, यह पैसा मांग संख्या 34 के तहत सामाजिक सुरक्षा एवं कल्याण मद से निकाला गया। कागजों पर दावा है कि जिले को नशा मुक्त करने के लिए होर्डिंग्स लगाए गए और घर-घर पाम्पलेट बांटे गए। लेकिन स्थानीय नागरिकों की मानें तो उन्हें ऐसे किसी अभियान की भनक तक नहीं है।
    आरटीआई एक्टिविस्ट दिलेराम सेन का तीखा प्रहार:
    “यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि सीधे तौर पर शासन और जनता के साथ धोखाधड़ी है। जब प्रचार सामग्री छपी ही नहीं या लगी ही नहीं, तो भुगतान कैसे हो गया? क्या अधिकारियों ने आंखें मूंदकर फाइलों पर दस्तखत किए या वे भी इस खेल का हिस्सा हैं?”

    ❓ जवाबदेही की कसौटी पर प्रशासन
    इस खुलासे ने जिला प्रशासन और समाज कल्याण विभाग की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
    भौतिक सत्यापन (Physical Verification): क्या भुगतान से पहले किसी अधिकारी ने मौके पर जाकर देखा कि होर्डिंग लगे भी हैं या नहीं?
    टेंडर प्रक्रिया: क्या इतनी बड़ी राशि के काम के लिए पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई गई?
    मौन साधे जिम्मेदार: इतनी बड़ी गड़बड़ी उजागर होने के बाद भी विभाग की चुप्पी ‘मौनं स्वीकृति’ की ओर इशारा कर रही है
  • नशा बंद नहीं, बस फाइलें ‘मस्त’ हैं!
    जिले में नशे का कारोबार फल-फूल रहा है, युवा बर्बादी की ओर हैं, और विभाग नशा मुक्ति के बजट से अपनी ‘फाइलें’ दुरुस्त करने में व्यस्त है। “नशा बंद है” का नारा सिर्फ दीवारों पर नहीं, शायद विभाग की नैतिकता पर भी लागू हो गया है। अब देखना यह है कि क्या कलेक्टर महोदय इस “कागजी प्रचार” की जांच कराएंगे या यह मामला भी पुरानी फाइलों की तरह धूल फांकेगा
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