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प्रशासनिक निष्पक्षता पर प्रहार: अनुविभागीय अधिकारी राजस्व गिरौद की जांच में ‘अपनों’ का पहरा, क्या कोटवार करेंगे दूध का दूध और पानी का पानी?

लव कुमार पटेल। रायपुर/महासमुंद।छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) गिरौद के खिलाफ चल रही जांच चर्चा का विषय बनी हुई है। जांच प्रक्रिया में हो रही देरी और जांच अधिकारी की नियुक्ति को लेकर शिकायतकर्ता ने अब मोर्चा खोल दिया है, जिससे शासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

​विवाद की जड़: अपनों के बीच ‘अपनों’ की जांच?

महासमुंद निवासी श्री लव कुमार पटेल( RTI activist)द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत में सबसे बड़ा मुद्दा ‘हितों के टकराव’ (Conflict of Interest) का है। उनका तर्क है कि एक ही जिले में कार्यरत डिप्टी कलेक्टर द्वारा अपने ही समकक्ष या वरिष्ठ अधिकारी की जांच करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

​”जब जांच करने वाला और जिसकी जांच हो रही है, दोनों एक ही कलेक्टर के अधीन कार्य कर रहे हों, तो रिपोर्ट की निष्पक्षता पर संदेह होना स्वाभाविक है।” — लव कुमार पटेल, शिकायतकर्ता

​जांच का घटनाक्रम: फाइलों में दबी रफ्तार

​मामले की गंभीरता को इस समयरेखा (Timeline) से समझा जा सकता है:

  • ​24 मार्च 2025: एसडीओ के विरुद्ध सेवा से बर्खास्तगी की मांग के साथ शिकायत दर्ज।
  • ​15 मई 2025: सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने रायपुर कमिश्नर को जांच के निर्देश दिए।
  • ​20 जून 2025: डिप्टी कलेक्टर श्रीमती रजनी छडीमली को जांच अधिकारी नियुक्त कर 7 दिनों में रिपोर्ट मांगी गई।
  • ​वर्तमान स्थिति: महीनों बीत जाने के बाद भी ‘7 दिन’ की समय सीमा वाली रिपोर्ट अब तक ठंडे बस्ते में है।

​कोटवारों से जांच की ‘अनोखी’ मांग

​इस मामले में एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब शिकायतकर्ता ने पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए 10 कोटवारों की विशेष टीम से जांच कराने की मांग रखी। हालांकि यह मांग प्रशासनिक प्रोटोकॉल से हटकर है, लेकिन यह व्यवस्था के प्रति आम जन के अविश्वास और हताशा को दर्शाती है।

​मुख्य आपत्तियां और मांगें:

  1. ​स्वतंत्र एजेंसी की आवश्यकता: वर्तमान जांच को तत्काल रोककर किसी बाहरी जिले या उच्च स्तरीय समिति से जांच कराई जाए।
  2. ​समय सीमा का उल्लंघन: निर्धारित 7 दिनों की जगह महीनों का विलंब अधिकारियों की मंशा पर संदेह पैदा करता है।
  3. ​दबाव की आशंका: स्थानीय स्तर पर जांच होने से गवाहों और साक्ष्यों के प्रभावित होने का डर।

​मंत्रालय की हलचल

​सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय (महानदी भवन) में बैठे उच्च अधिकारी इस मामले की समीक्षा कर रहे हैं। GAD इस बात की जांच कर रहा है कि कमिश्नर के निर्देश के बावजूद स्थानीय स्तर पर जांच अधिकारी की नियुक्ति में नियमों का उल्लंघन हुआ है या नहीं। आने वाले दिनों में रायपुर संभाग से इस विलंब पर जवाब तलब किया जा सकता है।

यह मामला केवल एक अधिकारी के विरुद्ध शिकायत का नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक पारदर्शिता की परीक्षा बन गया है। यदि समय रहते निष्पक्ष जांच सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न होगा।

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