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अजब गजब: बलौदाबाजार में छपाई की मशीन से निकलने लगीं रोटियां! ‘नशा मुक्ति’ के नाम पर भ्रष्टाचार का ऐसा ‘नशा’ आपने पहले नहीं देखा होगा

दिले राम सेन। बलौदाबाजार। छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार में सरकारी धन की बंदरबांट का एक ऐसा अनोखा मामला सामने आया है, जिसे सुनकर आप भी हैरान रह जाएंगे। यहाँ ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ के नाम पर कागजों में तो पेट भर भोजन परोसा गया, लेकिन बिल उस दुकान का लगा दिया गया जहाँ कागजों की छपाई होती है।

प्रिंटिंग प्रेस में ‘दाल-चावल’? RTI ने उड़ाई विभाग की नींद

आरटीआई (RTI) कार्यकर्ता दिले राम सेन द्वारा निकाले गए दस्तावेजों ने समाज कल्याण विभाग के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। दस्तावेजों के मुताबिक, 30 मई 2025 को ‘नर्मल ऑफसेट प्रिंटर्स’ के नाम पर 39,100 रुपये का भुगतान किया गया। बिल में चौंकाने वाली बात यह है कि प्रिंटिंग प्रेस ने विभाग को ‘विजिटिंग कार्ड’ या ‘बैनर’ नहीं, बल्कि:

  • 85 व्यक्तियों के लिए 2 दिन का भोजन
  • पानी की बाल्टी और पानी की बोरियां सप्लाई की हैं।

बड़ा सवाल: क्या अब बलौदाबाजार के प्रिंटिंग प्रेस में रोटियां सिंकने लगी हैं? क्या मशीनों के बीच बैठकर लोगों ने भोजन किया या फिर विभाग ने भ्रष्टाचार की नई ‘प्रिंटिंग मशीन’ लगा ली है?

GST नियमों की भी धज्जियां उड़ीं

​मामला सिर्फ गलत बिल का नहीं, बल्कि कानूनी उल्लंघन का भी है। बिल पर दर्ज GSTIN (22ADFPV8595L1ZP) एक ‘कंपोजीशन डीलर’ का है। नियमों के मुताबिक, एक छपाई का काम करने वाला कंपोजीशन डीलर खाद्य सामग्री की आपूर्ति का ऐसा बिल जारी ही नहीं कर सकता। यह साफ तौर पर वित्तीय धोखाधड़ी और टैक्स नियमों की अवहेलना का मामला है।

समाज कल्याण विभाग की चुप्पी पर सवाल

​यह पूरा फर्जीवाड़ा उप-संचालक, समाज कल्याण विभाग, बलौदाबाजार-भाटापारा के नाक के नीचे हुआ। जनता अब विभाग से सीधे सवाल पूछ रही है:

  1. ​बिना भौतिक सत्यापन (Physical Verification) के एक प्रिंटिंग प्रेस का ‘भोजन बिल’ पास कैसे हो गया?
  2. ​क्या वाकई धरातल पर शिविर लगा था या सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाए गए?
  3. सरकारी खजाने में सेंध लगाने वाले इन अधिकारियों और वेंडरों पर कार्रवाई कब होगी
  4. “यह सीधा-सीधा सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला है। यदि निष्पक्ष जांच हुई तो विभाग के कई सफेदपोशों के चेहरे बेनकाब होंगे।”
    दिले राम सेन, आरटीआई कार्यकर्ता

    जांच की दरकार
    नशा मुक्ति जैसे पवित्र उद्देश्य के लिए आए फंड का इस तरह ‘भोजन’ बना लेना प्रशासनिक नैतिकता पर बड़ा धब्बा है। अब गेंद जिला प्रशासन और वित्तीय लेखा शाखा के पाले में है। क्या कलेक्टर इस मामले में संज्ञान लेकर दोषियों पर कार्यावाही कराएंगे, या फिर भ्रष्टाचार की यह फाइल भी फाइलों के ढेर में दब जाएगी?
    बलौदाबाजार की जनता पूछ रही है— साहब, छपाई की मशीन से निकला खाना कैसा था?
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