महेश्वर जायसवाल। बलौदा बाजार अर्जुनी ,,। एक तरफ सरकार ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान चलाकर भावनाओं के जरिए पर्यावरण संरक्षण की अलख जगा रही है, वहीं दूसरी ओर बलौदाबाजार जिले के महराजी जंगल (बीट क्रमांक 380) में वन माफियाओं का ‘कुल्हाड़ी राज’ चल रहा है। विभाग की रहस्यमयी चुप्पी ने अब कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।





ग्राउंड जीरो की हकीकत: कागजों पर हरियाली, जमीन पर ठूंठ
अर्जुनी रेंज के बीट क्रमांक 380 से आ रही तस्वीरें विचलित करने वाली हैं। यहां सालों पुराने हरे-भरे पेड़ों को बेरहमी से काटा जा रहा है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि अवैध कटाई का यह खेल हफ़्तों से जारी है, लेकिन वन विभाग के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।
“हम सूचना देकर थक चुके हैं, लेकिन कोई अधिकारी झांकने तक नहीं आता। ऐसा लगता है जैसे जंगल को माफियाओं के हवाले कर दिया गया है।” > — एक स्थानीय ग्रामीण
अभियान बनाम असलियत
हैरानी की बात यह है कि राज्य सरकार जिस ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बता रही है, महराजी जंगल में उसकी सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सवाल यह है कि:
- क्या विभाग की निगरानी प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है?
- क्या बिना विभागीय मिलीभगत के इतने बड़े पैमाने पर कटाई संभव है?
- सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच यह खाई आखिर कब भरेगी?
प्रमुख बिंदु: खतरे में पर्यावरण और वन्यजीव
- वन्यजीवों का पलायन: अंधाधुंध कटाई से जंगली जानवरों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं, जिससे आने वाले समय में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की आशंका है।
- प्रशासनिक मौन: सूचना के बावजूद कार्रवाई न होना विभाग की नीयत पर संदेह पैदा करता है।
- इतिहास की भागीदारी: यदि आज यह जंगल नष्ट होता है, तो वन विभाग की वर्तमान चुप्पी को भविष्य में ‘विनाश की भागीदारी’ के रूप में देखा जाएगा।
- अब कड़े कदम उठाने का समय
यह केवल पेड़ों की कटाई नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। अब जरूरत केवल जांच की नहीं, बल्कि उच्च स्तरीय हस्तक्षेप की है। दोषियों पर कड़ी कार्रवाई और वन अधिकारियों की जवाबदेही तय होना अनिवार्य है, ताकि ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान महज एक विज्ञापन बनकर न रह जाए।



