Homeword pressछेरछेरा: दान की गौरवशाली परंपरा या आधुनिक भटकाव का शिकार?

छेरछेरा: दान की गौरवशाली परंपरा या आधुनिक भटकाव का शिकार?


दिले राम सेन। छत्तीसगढ़ की माटी से उपजा छेरछेरा पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि राज्य की सामाजिक चेतना, कृषि संस्कृति और सामूहिक जीवन-दर्शन का जीवंत प्रतीक रहा है। पौष पूर्णिमा के अवसर पर मनाया जाने वाला यह पर्व अन्न की समृद्धि, दान की भावना और समाज के हर वर्ग को एक सूत्र में बांधने का माध्यम था। ग्रामीण अंचलों में बच्चे, युवा और बुजुर्ग टोली बनाकर घर-घर जाते, धान, चावल या अन्न ग्रहण करते और लोग इसे सौभाग्य मान कर खुशी मिलती है
छेरछेरा का मूल भाव था—जिसके पास है, वह साझा करे; और जिसके पास नहीं, वह भी पर्व का आनंद ले सके। यह पर्व सामाजिक बराबरी, सहयोग और आत्मीयता की मिसाल था, जिसमें अमीर-गरीब का भेद गौण हो जाता था।

हालांकि, आधुनिक समय में छेरछेरा की इस पवित्र परंपरा में कई जगहों पर विचलन और विकृति देखी जा रही है। कुछ क्षेत्रों में, विशेषकर शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में, यह देखने को मिल रहा है कि युवा वर्ग द्वारा छेरछेरा से प्राप्त धन या धान का उपयोग शराब सेवन, नशे और अनियंत्रित मौज-मस्ती में किया जा रहा है। इससे न केवल पर्व की गरिमा को ठेस पहुंच रही है, बल्कि समाज में गलत संदेश भी जा रहा है।


सामाजिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बदलाव केवल एक पर्व की समस्या नहीं, बल्कि मूल्यों के क्षरण और दिशाहीनता का संकेत है। जब परंपराएं अपने उद्देश्य से भटकने लगती हैं, तब आत्मचिंतन की आवश्यकता और बढ़ जाती है।

ग्रामीण बुजुर्गों और परंपराओं के जानकारों का कहना है कि छेरछेरा का संबंध कभी भी व्यक्तिगत उपभोग या नशे से नहीं रहा। पहले एकत्रित धान को सामूहिक भोज, साधु-संतों, विधवा महिलाओं, जरूरतमंद परिवारों या मंदिरों में दान किया जाता था। इससे समाज में अपनापन और सहयोग की भावना मजबूत होती थी।
आज जब कुछ स्थानों पर इस पर्व को अनुशासनहीनता और असंयम से जोड़ा जाने लगा है, तो यह सांस्कृतिक चेतना के लिए खतरे की घंटी है।

इसके बावजूद यह कहना अनुचित होगा कि छेरछेरा की आत्मा पूरी तरह खो गई है। आज भी छत्तीसगढ़ के अनेक गांवों, कस्बों और मोहल्लों में यह पर्व पूरी श्रद्धा, मर्यादा और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ मनाया जा रहा है। कई जगहों पर युवाओं की टोली स्वयं निर्णय लेकर एकत्रित धान को गरीब परिवारों, आश्रमों, गौशालाओं या सामुदायिक आयोजनों में उपयोग कर रही है।
यह दर्शाता है कि यदि सही मार्गदर्शन मिले, तो युवा पीढ़ी ही इस परंपरा की सबसे बड़ी संवाहक बन सकती है।

विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मत है कि छेरछेरा जैसे पर्वों को बचाने के लिए केवल आलोचना नहीं, बल्कि संस्कार, शिक्षा और संवाद की आवश्यकता है। स्कूलों में स्थानीय संस्कृति पर आधारित शिक्षा, पंचायतों की भूमिका, सांस्कृतिक समितियों के कार्यक्रम और परिवारों का मार्गदर्शन इस दिशा में अहम कदम हो सकते हैं।

छेरछेरा पर्व आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ से दो रास्ते निकलते हैं—एक परंपरा के क्षरण की ओर और दूसरा उसके पुनर्जागरण की ओर। यह हम सब पर निर्भर करता है कि हम इस पर्व को केवल एक रस्म बनाकर छोड़ दें या फिर इसे फिर से अन्न, दान, संवेदना और सामाजिक एकता का उत्सव बना सकें।
छत्तीसगढ़ की संस्कृति तभी जीवित रहेगी, जब उसके पर्व अपने मूल मूल्यों के साथ अगली पीढ़ी तक पहुंचेंगे।

RELATED ARTICLES
Jharkhand
broken clouds
34.7 ° C
34.7 °
34.7 °
35 %
0.9kmh
62 %
Sat
40 °
Sun
41 °
Mon
42 °
Tue
44 °
Wed
45 °

Most Popular