दिले राम सेन। जबलपुर | 1 मार्च 2026 मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सूचना के अधिकार (RTI) को लेकर एक ऐतिहासिक व्यवस्था दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि लोक सेवकों (Government Servants) को मिलने वाला वेतन सार्वजनिक धन है, इसलिए इसकी जानकारी को ‘व्यक्तिगत’ या ‘गोपनीय’ बताकर छिपाया नहीं जा सकता।

क्या है पूरा मामला? छिंदवाड़ा निवासी एम.एम. शर्मा ने वन परिक्षेत्र छिंदवाड़ा में कार्यरत दो कर्मचारियों के वेतन भुगतान के संबंध में आरटीआई के तहत जानकारी मांगी थी। हालांकि, लोक सूचना अधिकारी ने धारा 8(1)(j) का हवाला देते हुए इसे ‘तृतीय पक्ष’ (Third Party) की निजी जानकारी बताकर देने से इनकार कर दिया था। सूचना आयोग ने भी इस इनकार को बरकरार रखा, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुँचा।
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी और आदेश जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पूर्व के सभी आदेशों को निरस्त कर दिया। कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- पारदर्शिता सर्वोपरि: लोक सेवकों के वेतन की जानकारी सार्वजनिक महत्व की है। इसे धारा 8(1)(j) के तहत निजी सूचना मानकर संरक्षित नहीं किया जा सकता।
- धारा-4 का अनुपालन: आरटीआई अधिनियम की धारा-4 के तहत सरकारी विभागों को अपने कर्मचारियों के वेतन का विवरण स्वतः सार्वजनिक करना अनिवार्य है।
- सहमति की आवश्यकता नहीं: कोर्ट ने उस तर्क को भी खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि संबंधित कर्मचारियों ने जानकारी साझा करने की सहमति नहीं दी है।
- समय सीमा: माननीय न्यायालय ने याचिकाकर्ता को एक माह के भीतर अपेक्षित जानकारी उपलब्ध कराने के सख्त निर्देश दिए हैं।
विशेषज्ञों की राय: क्यों अहम है यह फैसला?
यह आदेश भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और सरकारी तंत्र में पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। अक्सर सूचना अधिकारी निजी जानकारी का बहाना बनाकर वेतन, भत्ते और एरियर की जानकारी छुपाते थे, जिस पर अब कानूनी रोक लग गई है।
“वेतन की जानकारी को सार्वजनिक करना सूचना का अधिकार अधिनियम के उद्देश्यों और पारदर्शिता के सिद्धांतों के अनुरूप है।” > — याचिकाकर्ता के अधिवक्ता



