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ऐतिहासिक फैसला: गिरफ्तार व्यक्ति की फोटो मीडिया में देना असंवैधानिक, राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा आदेश

गिरफ्तार व्यक्तियों को थाने के बाहर बैठाकर फोटो खींचना और मीडिया में प्रसारित करना असंवैधानिक,

दिले राम सेन। राजस्थान उच्च न्यायालय ने नागरिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक युगांतरकारी निर्णय सुनाते हुए पुलिस द्वारा गिरफ्तार व्यक्तियों की फोटो थाने के बाहर खींचने और उन्हें मीडिया या सोशल मीडिया पर प्रसारित करने को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस का यह कृत्य संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले ‘निजता और सम्मान के साथ जीने के अधिकार’ का सीधा उल्लंघन है।

मामला क्या है? (SBCWP No. 224/2026)

​न्यायालय ने यह फैसला एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने पुलिस की उस कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार किया है, जिसमें आरोपी को पकड़ते ही उसकी तस्वीर सार्वजनिक कर दी जाती है।

कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

​न्यायमूर्ति ने फैसले में कानून के शासन (Rule of Law) की याद दिलाते हुए कुछ गंभीर टिप्पणियाँ कीं:

  • दोषी और आरोपी में फर्क: कोर्ट ने कहा, “केवल गिरफ्तारी का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति अपराधी है। जब तक अदालत उसे दोषी न मान ले, वह निर्दोष है।”
  • छवि धूमिल करना अपराध: जांच पूरी होने से पहले ही किसी व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से अपराधी की तरह पेश करना उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुँचाता है।
  • मीडिया ट्रायल पर रोक: पुलिस द्वारा तस्वीरें जारी करने से मीडिया ट्रायल शुरू हो जाता है, जिससे निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया (Fair Trial) बाधित होती है।

पुलिस के लिए जारी नई गाइडलाइंस

​हाईकोर्ट ने इस फैसले के साथ ही पुलिस प्रशासन को सख्त हिदायत दी है:

  1. सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक: गिरफ्तारी के बाद किसी भी व्यक्ति को मीडिया के सामने परेड नहीं कराया जाएगा।
  2. सोशल मीडिया पर सख्ती: आरोपी की फोटो को पुलिस के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल या व्हाट्सएप ग्रुप्स पर साझा करना प्रतिबंधित होगा।
  3. कानूनी मर्यादा: किसी भी सामग्री को सार्वजनिक करने से पहले कानूनी और मानवाधिकार मर्यादाओं का पालन अनिवार्य है।

इस फैसले का महत्व

​कानूनी जानकारों का मानना है कि अक्सर पुलिस अपनी ‘वाहवाही’ लूटने के लिए आनन-फानन में आरोपियों की तस्वीरें साझा कर देती है। कई मामलों में आरोपी बाद में निर्दोष पाए जाते हैं, लेकिन तब तक उनका सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन तबाह हो चुका होता है। यह फैसला ‘निजता के अधिकार’ (Right to Privacy) को पुलिस की शक्ति से ऊपर रखता है।

​”यह निर्णय न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार लाएगा, बल्कि आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक ढाल का काम करेगा।”

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