दिले राम सेन। RTI के दुरुपयोग पर हाईकोर्ट सख्त, डॉक्टर की अपील खारिज; ₹25 हजार का हर्जाना बरकरार
इंदौर। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के कथित दुरुपयोग को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए डॉ. प्रकाश तारे की रिट अपील खारिज कर दी है। अदालत ने न सिर्फ रिट कोर्ट द्वारा लगाए गए ₹25,000 के हर्जाने को सही ठहराया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि RTI कानून का उद्देश्य लोक सूचना अधिकारियों को परेशान करना नहीं है।
मामले के अनुसार, अपीलकर्ता डॉ. प्रकाश तारे और प्रत्यर्थी डॉ. संजय वैद्या, दोनों कर्मचारी राज्य बीमा (ESI) अस्पताल, इंदौर में विशेषज्ञ डॉक्टर के रूप में कार्यरत थे। डॉ. वैद्या को अस्पताल का लोक सूचना अधिकारी (PIO) नियुक्त किया गया था।
डॉ. तारे ने RTI आवेदन के माध्यम से ऑडिट रिपोर्ट और कुछ पत्रों से जुड़ी जानकारी मांगी थी। उनका आरोप था कि जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं कराई गई। इस पर राज्य सूचना आयोग ने देरी के लिए डॉ. वैद्या पर ₹5,000 का जुर्माना लगाया था।
डॉ. वैद्या ने आयोग के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। 20 अगस्त 2019 को रिट कोर्ट ने राज्य सूचना आयोग के आदेश को रद्द कर दिया और यह टिप्पणी की कि डॉ. तारे ने RTI प्रावधानों का दुरुपयोग किया है। कोर्ट ने अपीलकर्ता पर ₹25,000 का हर्जाना भी लगाया।
इसके बाद डॉ. तारे की ओर से दायर पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी गई, साथ ही ₹10,000 का अतिरिक्त हर्जाना लगाया गया।
रिट अपील में डॉ. तारे के वकील ने तर्क दिया कि हर्जाना वास्तव में राज्य सूचना आयोग के सचिव पर लगाया जाना चाहिए था, लेकिन गलती से अपीलकर्ता पर थोप दिया गया।
हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि अपीलकर्ता ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया है। अदालत ने उल्लेख किया कि राज्य सूचना आयोग ने अपने 27 मार्च 2023 के आदेश में पहले ही यह मान लिया था कि मांगी गई पूरी जानकारी उपलब्ध करा दी गई थी।
कोर्ट ने यह भी माना कि डॉ. तारे का उद्देश्य सूचना प्राप्त करना नहीं, बल्कि बार-बार शिकायतें और अपीलें दायर कर डॉ. वैद्या को मानसिक रूप से परेशान करना था, जो स्वयं एक विशेषज्ञ डॉक्टर हैं।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि RTI अधिनियम पारदर्शिता के लिए बनाया गया है, न कि लोक सूचना अधिकारियों या सरकारी कर्मचारियों को उत्पीड़न का शिकार बनाने के लिए।
इन आधारों पर हाईकोर्ट ने रिट अपील को खारिज करते हुए रिट कोर्ट द्वारा लगाए गए ₹25,000 के हर्जाने को बरकरार रखा और मामले का पटाक्षेप कर दिया।
यह फैसला RTI के नाम पर की जा रही अनावश्यक मुकदमेबाजी और उत्पीड़न के खिलाफ एक अहम नजीर के रूप में देखा जा रहा है।



