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फर्जी मार्कशीट से सरकारी नौकरी का मामला: शिक्षक निलंबित, पर शासन-प्रशासन की कार्रवाई पर उठे बड़े सवाल

2011 की नियुक्ति दस्तावेज पर 2012 में बने जिले की सील! प्राथमिक जांच में गड़बड़ी उजागर होने के बावजूद अब तक महज निलंबन क्यों?

बलौदाबाजार। फर्जी और कूटरचित शैक्षणिक दस्तावेजों के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल करने के एक गंभीर मामले में शिक्षा विभाग ने कसडोल विकासखंड के शासकीय प्राथमिक शाला कंजिया में पदस्थ सहायक शिक्षक (एल.बी.) रामेश्वर प्रसाद साहू को निलंबित कर दिया है। जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) बलौदाबाजार-भाटापारा द्वारा की गई इस कार्रवाई के बाद अब विभागीय कार्यप्रणाली और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

​यह मामला केवल एक शिक्षक के निलंबन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी सरकारी भर्ती व्यवस्था की पारदर्शिता और प्रामाणिकता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।

​जनदर्शन की शिकायत से खुला फर्जीवाड़े का राज

​मामले का खुलासा पिसीद (कसडोल) निवासी हेमदास मानिकपुरी द्वारा कलेक्टर जनदर्शन में प्रस्तुत शिकायत से हुआ। शिकायत के अनुसार:

  • 2011 में नियुक्ति: आरोपी शिक्षक रामेश्वर प्रसाद साहू ने वर्ष 2011 में कथित फर्जी डी.एड. (D.Ed.) प्रमाण पत्र के आधार पर शिक्षाकर्मी वर्ग-03 पद पर नियुक्ति पाई थी।
  • 11 साल बाद असली डिग्री: नियुक्ति के लगभग 11 वर्षों बाद उन्होंने पंडित सुंदरलाल शर्मा (मुक्त) विश्वविद्यालय, बिलासपुर से पुनः डी.एड. की पढ़ाई पूरी की।
  • संदेहास्पद दस्तावेज: नियुक्ति के समय प्रस्तुत डी.एड. प्रमाण पत्र (रोल नंबर: 47240442) की सत्यता पर गंभीर विसंगतियां पाई गईं।

​कलेक्टर के निर्देश पर जनपद पंचायत कसडोल के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) और विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) द्वारा कराई गई जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।

​2011 की रिपोर्ट पर 2012 में बने जिले की सील कैसे?

​जांच का सबसे संदिग्ध पहलू दस्तावेजों में मौजूद प्रशासनिक विरोधाभास है:

  1. 04 जनवरी 2011 को पदभार ग्रहण करते समय प्रस्तुत डी.एड. प्रमाण पत्र की सील पर ‘जिला रायपुर’ अंकित था।
  2. ​बाद में प्रस्तुत दूसरी रिपोर्ट में उसी दस्तावेज पर ‘जिला बलौदाबाजार’ की सील पाई गई।

बड़ा सवाल: बलौदाबाजार जिला वर्ष 2012 में अस्तित्व में आया, जबकि संबंधित शिक्षक ने वर्ष 2011 में कार्यभार ग्रहण किया था। 2011 के दस्तावेज पर बाद में बने जिले की सील का मिलना यह स्पष्ट संकेत देता है कि दस्तावेजों के साथ बाद में गंभीर छेड़छाड़ या कूटरचना की गई है।

​निलंबन पर क्यों थमी कार्रवाई?

​जिला शिक्षा अधिकारी ने ‘छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966’ के नियम 9 के तहत शिक्षक को निलंबित कर उनका मुख्यालय BEO कार्यालय पलारी तय किया है। लेकिन जनसाधारण और बुद्धिजीवी वर्ग के बीच यह सवाल उठ रहा है कि:

  • निलंबन ही क्यों? जब प्राथमिक जांच में ही दस्तावेज कूटरचित पाए गए हैं, तो केवल निलंबन और जीवन निर्वाह भत्ता देना कहां तक उचित है?
  • 11 साल का वेतन और खजाना: गलत दस्तावेजों के आधार पर 11 वर्षों तक लिए गए सरकारी वेतन की रिकवरी के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे?
  • आपराधिक मामला (FIR): फर्जीवाड़े और कूटरचना के इस मामले में अब तक पुलिस FIR दर्ज क्यों नहीं कराई गई?

​प्रशासनिक जवाबदेही पर मुख्य सवाल

  1. सत्यापन में चूक: 2011 में नियुक्ति के समय किस अधिकारी या समिति ने इन दस्तावेजों का भौतिक सत्यापन किया था?
  2. समयबद्ध जांच: विभागीय जांच पूरी करने की अंतिम समयसीमा क्या है, या यह मामला फाइलों में वर्षों दबा रहेगा?
  3. अन्य प्रकरणों की जांच: क्या शिक्षा विभाग इस मामले के बाद जिले में हुई अन्य पुरानी नियुक्तियों के दस्तावेजों की भी स्क्रूटनी कराएगा?

​न्याय और पारदर्शिता की दरकार

​एक तरफ जहां लाखों योग्य एवं शिक्षित बेरोजगार युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में मेहनत करते हैं, वहीं दूसरी तरफ फर्जी दस्तावेजों के सहारे सरकारी सेवा में प्रवेश कर सालों तक वेतन उठाना पूरी व्यवस्था के साथ खिलवाड़ है।

​निलंबन को इस मामले का अंत नहीं, बल्कि एक पारदर्शी और कठोर कानूनी प्रक्रिया की शुरुआत माना जाना चाहिए। यदि जांच में कूटरचना सिद्ध होती है, तो सेवा से बर्खास्तगी, वित्तीय वसूली और आपराधिक प्रकरण दर्ज कराकर एक कड़ा संदेश देना आवश्यक है ताकि सरकारी भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनी रहे।

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