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“ग्राम पंचायत मल्दा में ‘लूट’ की पहली रिपोर्ट ‘फाइल’ में  कैद,,,दोबारा जांच की आड़ में क्या सच दफनाने की तैयारी?”

हेमदास मानिकपुरी। कसडोल:ग्राम पंचायत मल्दा (जनपद पंचायत कसडोल) में सरकारी खजाने की बंदरबांट का एक ऐसा मामला सामने आया है, जहाँ नियम और कायदे कागजों तक सीमित रह गए हैं। 14वें और 15वें वित्त आयोग की राशि में हुई ₹15 लाख से अधिक की वित्तीय अनियमितता पहली जांच में सिद्ध हो चुकी है, लेकिन प्रशासन ‘वसूली’ के बजाय ‘पुनः जांच’ का खेल खेल रहा है।

जांच में खुलासा: परिवार को ‘तोहफे’ में बांटी सरकारी राशि

​जनपद पंचायत कसडोल के सहायक लेखा परीक्षक श्री सदनलाल ध्रुव की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट ने भ्रष्टाचार की परतें खोल दी थीं। रिपोर्ट के अनुसार:

  • बिना टेंडर बंदरबांट: किसी भी टेंडर प्रक्रिया का पालन किए बिना, सरपंच ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया।
  • अपनों पर मेहरबानी: सीधे DSC (डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट) के जरिए:
    • ​पति कुलेश्वर केंवट को ₹2,43,000 का भुगतान।
    • ​देवर योगेश निषाद को ₹12,59,728 का भुगतान।
  • नियमों की धज्जियां: जांच में स्पष्ट कहा गया कि यह भुगतान शासन के वित्तीय नियमों के पूर्णतः विरुद्ध है।

प्रशासनिक रहस्य: जब गुनाह कबूल, तो दोबारा जांच क्यों?

सवाल यह उठता है कि जब पहली जांच में दूध का दूध और पानी का पानी हो चुका था, तो अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) कसडोल द्वारा दोबारा जांच के आदेश क्यों दिए गए?

संदेह के घेरे में कार्रवाई:

  1. वसूली में देरी: क्या दोबारा जांच केवल समय काटने और आरोपियों को राहत देने का एक जरिया है?
  2. गोपनीयता का खेल: प्रशासन ने अब तक सार्वजनिक नहीं किया है कि पहली जांच में ऐसी क्या कमी थी जिसे पूरा करने के लिए फिर से टीम बिठानी पड़ी।
  3. सांठगांठ की आशंका: बिना तकनीकी स्वीकृति के हुए इन भुगतानों में क्या निचले स्तर से लेकर उच्च स्तर तक कोई आंतरिक सांठगांठ है?

  4. “जांच रिपोर्ट में अनियमितता स्पष्ट है। अब अवैध रूप से आहरित राशि की तत्काल वसूली होनी चाहिए। बार-बार जांच के नाम पर मामले को कमजोर किया जा रहा है।” > — हेमदास मानिकपुरी, शिकायतकर्ता

    पंचायत राज अधिनियम की उड़ती धज्जियां
    जानकारों का मानना है कि यदि पहली रिपोर्ट में वित्तीय गबन की पुष्टि हो गई थी, तो ‘पंचायत राज अधिनियम’ की धाराओं के तहत सरपंच को पदमुक्त करने और धारा 92 के तहत वसूली की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए थी। दोबारा जांच का निर्णय न केवल शिकायतकर्ता के मनोबल को तोड़ता है, बल्कि जनता के उस भरोसे को भी खत्म करता है जो वह अपनी ग्राम सरकार पर करती है।
    निष्कर्ष: अब गेंद प्रशासन के पाले में
    मल्दा पंचायत का यह प्रकरण अब कसडोल प्रशासन की साख का सवाल बन चुका है। क्या शासन की राशि की वसूली होगी, या फिर यह मामला भी फाइलों के ढेर में दबकर रह जाएगा?
    हमारी मांग/अपेक्षा:
    पहली जांच के आधार पर अविलंब रिकवरी नोटिस जारी हो।
    पुनः जांच की आवश्यकता पर प्रशासन श्वेत पत्र जारी करे।
    दोषियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई कर उदाहरण पेश किया जाए।
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