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सूचना के अधिकार की धज्जियां: जनपद CEO के आदेश को कुरमाझर सचिव ने दिखाया ठेंगा, अब राज्य सूचना आयोग में होगी खिंचाई

हेमदास मानिकपुरी। कसडोल | शासन की योजनाओं में पारदर्शिता लाने के लिए बनाए गए सूचना का अधिकार (RTI) कानून को कसडोल क्षेत्र में सरकारी मुलाजिम ही ठेंगा दिखा रहे हैं। ताजा मामला ग्राम पंचायत कुरमाझर का है, जहां सचिव की मनमानी के आगे जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) का आदेश भी बौना साबित हो गया। अब हार मानकर अपीलार्थी ने राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया है।

​क्या है पूरा मामला?

​अपीलार्थी श्री हेमदास मानिकपुरी ने 19 सितंबर 2025 को एक RTI आवेदन लगाकर ग्राम पंचायत कुरमाझर में हुए वित्तीय लेन-देन का हिसाब मांगा था। उन्होंने विशेष रूप से यह जानकारी चाही थी कि:

  • ​वर्तमान सरपंच द्वारा डीएससी (DSC) के माध्यम से किन-किन फर्मों को भुगतान किया गया?
  • ​भुगतान से संबंधित बिल-वाउचर की सत्यापित छायाप्रति उपलब्ध कराई जाए।

​CEO के आदेश की भी अनसुनी

​जब निर्धारित समय सीमा में जानकारी नहीं मिली, तो मामला प्रथम अपीलीय अधिकारी और जनपद CEO श्री कमलेश कुमार साहू के पास पहुँचा। 19 नवंबर 2025 को सुनवाई (प्रकरण क्रमांक 20/2025) के दौरान न तो सचिव उपस्थित हुए और न ही कोई जवाब भेजा।

​CEO ने कड़ा रुख अपनाते हुए सचिव को 15 दिनों के भीतर समस्त जानकारी उपलब्ध कराने का स्पष्ट लिखित आदेश दिया था। लेकिन आदेश के हफ़्तों बीत जाने के बाद भी सचिव की कुंभकर्णी नींद नहीं खुली है।

​”प्रथम अपीलीय अधिकारी के आदेश की अवहेलना करना प्रशासनिक अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा है। यह सीधे तौर पर जानकारी छिपाने और भ्रष्टाचार को संरक्षण देने जैसा है।”

— हेमदास मानिकपुरी, अपीलार्थी

​क्यों उठ रहे हैं सवाल?

​इस मामले ने पंचायत राज व्यवस्था और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:

  1. ​जवाबदेही का अभाव: क्या सचिव को उच्च अधिकारियों के दंड का भय नहीं है?
  2. ​भ्रष्टाचार की आशंका: आखिर बिल-वाउचर देने में सचिव क्यों कतरा रहे हैं? क्या भुगतान में कोई गड़बड़ी हुई है?
  3. ​आम जनता की परेशानी: एक जागरूक नागरिक को अपनी ही पंचायत का हिसाब मांगने के लिए राजधानी (राज्य सूचना आयोग) तक के चक्कर क्यों काटने पड़ रहे हैं?

​अब राज्य सूचना आयोग करेगा फैसला

​लगातार मिल रही उपेक्षा से परेशान होकर अपीलार्थी अब द्वितीय अपील दायर करने जा रहे हैं। RTI कानून के तहत यदि राज्य सूचना आयोग दोषी अधिकारी को पाता है, तो उन पर 250 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से अधिकतम 25,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। साथ ही सेवा पुस्तिका में प्रतिकूल टिप्पणी भी दर्ज की जा सकती है।

​अब देखना यह होगा कि राज्य सूचना आयोग की फटकार के बाद कुरमाझर पंचायत के अभिलेख सामने आते हैं या सचिव की यह मनमानी जारी रहती है।

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